29 Mar 2017, 01:06:46 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

-वीना नागपाल

एक वैन में जहां लगभग आठ लोगों के बैठने की सुविधा थी वहां 18 बच्चे भरे हुए थे। वैन के दरवाजे बंद होते हैं और इतनी ठसाठसी में सांस लेने की भी सुविधा नहीं हो सकती। ड्राइवर, उसके साथी और बच्चों द्वारा छोड़ी गई सांसों की कार्बन-डाइ आॅक्साइड के अतिरिक्त ताजी या आॅक्सीजन से भरी हवा में सांस लेने का कोई रास्ता नहीं होता। यह गहरी चिंता व सोच की बात है कि इस तरह छोटे बच्चे अपने-अपने बैग्स के भार से लदे व कंधों पर अपनी वाटर बॉटल्स के स्ट्रेप को संभालते कैसे घर से स्कूल और स्कूल से घर आते होंगे?

वैन और आॅटो रिक्शा में इस तरह गठरियों की तरह लादे गए बच्चों के लिए यह एक यातना शिविर है। सुनते हैं मध्य युग में जिसे ‘डार्क’ युग (अंधेरा युग) भी कहा जाता है उसके तथा हिटलर द्वारा यहूदियों को दिए जाने वाले कठोर से कठोरतम दंड में कैदियों को इसी तरह एक छोटी सी जगह में बड़ी संख्या में ठूंस दिया जाता था। क्या हमारे अत्यंत प्रिय, हमारी आशाओं के स्वरूप और हमारी ममता व स्नेह के केंद्र यह मासूम, कोमल आयु के बच्चे उन्हीं कैदियों की तरह बंद होने के लिए मजबूर हैं। जब चेकिंग होती है (जो कि कभी-कभार ही होती है) तब इस तरह की भरी हुई वैन और आॅटो रिक्शा या वैन में बहुत प्यार जताते हुए उन्हें बैठाकर हाथ उठाकर ‘टाटा’ और ‘बाय-बाय’ करते हैं। पालक अपनी मजबूरी बताते हुए कहते हंै कि तो कैसे अपने बच्चों को स्कूल भेजें, दोनों कामकाजी हैं। दौड़ते-भागते उन्हें अपने-अपने कार्य स्थल पर पहुंचना होता है। वाहन होते हुए भी उनके पास इतना समय नहीं है कि वह बच्चों को स्कूल छोड़ भी आएं और लेकर भी आ जाएं, क्योंकि कार्यस्थल से निकलकर ऐसा करना संभव नहीं होता। किसी भी स्कूल की बसें इतनी संख्या में नहीं होतीं कि वह भी बच्चों को लाएं और ले जाएं, क्योंकि वह अधिक संख्या में प्रवेश तो दे देते हैं इसलिए कि यह उनके व्यापार व व्यवसाय का सबसे बड़ा स्त्रोत है पर, बच्चों के आवागमन की व्यवस्था नहीं करते।

तब क्या बच्चों को स्कूल भेजने के लिए इन्हीं यातना शिविरों में घुसकर आना व जाना होगा? इसके लिए एक प्रयास यह हो सकता है कि पैरेंट्स ऐसी वैन या रिक्शा का चुनाव करें जिसमें कम संख्या में ही बच्चे लेकर वह जाएं। यदि पैरेंट्स इस तरह से भीड़ भरी उस वैन और रिक्शा को नकार देंगे तो उसके स्थान पर दूसरी वैन या रिक्शा इसी कार्य में लग जाएगी। इसके लिए एक ही ओर से आने वाले बच्चों के पैरेंट्स आपस में मिलकर भी इसकी व्यवस्था कर सकते हैं। इसका दूसरा कारगर उपाय व सशक्त तरीका यह है कि शासन द्वारा इसके लिए बहुत सख्त और कठोर कदम उठाए जाएं। यातायात पुलिस द्वारा वैन और रिक्शों की एक-दो बार नहीं बल्कि बार-बार चेकिंग की जाए। चौराहों से गुजरती इन वैन और रिक्शा आदि पर पुलिस की गहरी और पैनी नजर हो और इन्हें वहीं रोककर इनके लाइसेंस जब्त कर लिए जाएं। वैसे तो स्कूलों के प्रारंभ होने वाले सत्रों में ही यह सख्ती बरत ली जाए तो पर्याप्त होगा, क्योंकि उसी समय ही बच्चों को स्कूल भेजने की व्यवस्था पैरेंट्स करते हैं।

बच्चों को घरों में व परिवारों में सब सुविधाओं की व्यवस्था देने और इसके लिए जुटे रहने वाले पैरेंट्स यह कैसे सहन कर लेते हैं कि उनकी लाड़ली संतान इस तरह से दब-घुटकर स्कूल जाए और घर आए। जिन बच्चों को इस दमघोटू माहौल से गुजरकर आना व जाना पड़ता है वह कैसे अपनी पढ़ाई में रुचि दिखा सकते हैं या उसमें एकाग्र हो सकते हैं? उनके लिए तो उस यातना भरे समय से उबरने में ही समय लग जाता होगा। बच्चों की इस पीड़ा को समझा जाए। यह माहौल उनके स्वास्थ्य के लिए भी सही नहीं है। जहां बच्चों के लिए भारी-भरकम फीस की व्यवस्था करते हैं तो उनके लिए अच्छे और स्वस्थ यातायात की भी व्यवस्था की जाए। पैरेंट्स बच्चों को इस कैद की यातना से मुक्त करने का प्रयास करें।

nagpal.veena@yahoo.com

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