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Astrology

चैत्र नवरात्र में कैसे करें घट स्‍थापना एवं उसकी पूजा

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Apr 6 2019 2:56AM | Updated Date: Apr 6 2019 2:56AM
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आज नव संवत्सर का प्रवेश होगा चैत्र नवरात्रों के साथ

हिंदू पंचांग के अनुसार नव संवत्सर का प्रवेश चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को नवरात्रों के साथ होता है। इस वर्ष 2076 परिधारी नामक संवत्सर के साथ चैत्र नवरात्रों का प्रारंभ होगा। आज भगवती शैलपुत्री की पूजा के साथ ही नौ दिवसीय वासंती नवरात्रों का प्रारंभ हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष नवरात्र 5 वर्षों के पश्चात पूरे 9 दिनों के पडने जा रहे हैं। इसके पूर्व वर्ष 2014 में चैत्र नवरात्र पूरे 9 दिन के पड़े थे। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार 9 दिन के नवरात्र शुभ माने गए हैं क्योंकि इसमें तिथि का क्षय या वृद्धि नहीं होती है। देवी पुराण की मान्यताओं के अनुसार 18 भुजा वाली महालक्ष्मी महीश मर्दिनी चैत्र नवरात्र में उत्पन्न हुई थी। चैत्र नवरात्रों का प्रारंभ आज घटस्थापना के साथ होगा तथा समापन 14 अप्रैल को रामनवमी के दिन देवी विसर्जन के साथ किया जाएगा।

 
घटस्थापना से होगा दुर्गा पूजा का श्रीगणेश
घटस्थापना दो प्रकट नवरात्रों एवं जो गुप्त नवरात्रों में की जाने वाली देवी साधना का अपरिहार्य अंग है। इसी के साथ ही नौ दिवसीय दुर्गा पूजा का शुभारंभ भी हो जाता है । घटस्थापना से भगवती दुर्गा का आवाहन करते हुए उन्हें आमन्त्रित किया जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार गलत समय पर किया जाने वाला आवाहन देवी शक्ति का क्रोध और विमुखता का कारण बन सकता है। अतः घटस्थापना मुहूर्त का चयन अत्यधिक महत्तपूर्ण है। घटस्थापना के लिये अमावस्या तिथि और रात्रि का समय निषिद्ध है। घटस्थापना का मुहूर्त, प्रतिपदा तिथि में दिन के पहले एक तिहाई भाग में, सबसे उपयुक्त होता है। 
 
घट में विराजते हैं देवता
शास्त्रों में विधिपूर्वक एवं शुभ मुहूर्त में स्थापित कलश या घट को विघ्न विनाशक, शुभ मंगल दायक, देवों में अग्रणी भगवान गणेश का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि कलश के मुख पर विष्णु वा कण्ठ में रूद्र का निवास होता है। कलश मूल में ब्रह्मा तो मध्य में मातृ गण स्थापित रहते हैं। कलश के उदर कोख में पृथ्वी के सातों समुद्रों का जल होना माना गया है, तो चारों वेद भी अपने अंग- उपांगों सहित कलश में निवास करते हैं। इस प्रकार से कलश संपूर्ण रूप से मांगल्यप्रद माना गया है।प्रातः घटस्थापना से देवी पूजन का प्रारंभ नवरात्र में किया जाता है, चूँकि यह मंगलकारी होने के साथ-साथ विघ्न बाधाओं एवं आसुरी प्रवृतियों का स्वत: नाश कर देता है।
 
घट स्थापना के शास्त्रीय विधान
घट स्थापना करने के लिए सर्वप्रथम खेत की मृतिका की दो उंगल चौड़ी सतह बनाकर उसमें सप्तधान्य या जौ बो दें । कलश के उदर में गंगाजल, फूल, गंध, सुपारी, अक्षत, पंचरत्न एवं सिक्के डाले।कलश मुख में आम के पांच  पल्लव लगाने के साथ चुनरि या लाल वस्त्र में बांधकर नारियल को स्थापित करें। कलश स्थापना में समस्त पवित्र नदियों, तीर्थों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशाओं, नगर, ग्राम एवं कुल देवताओं के साथ समस्त योगिनियों को पूजा में आमंत्रित किया जाता है। कलश पर मंगलकारी चिन्ह स्वास्तिक अंकित करना चाहिए। तत्पश्चात देवी का आवाहन करते हुए उनका षोडशोपचार पूजन किया जाना चाहिए। धूप-दीप-नैवेद्य वस्त्र -अलंकार- आभूषण-श्रंगार समर्पित करते हुए देवि को अपनी शक्तियों सहित पधारने का निमंत्रण देना चाहिए।चैत्र नवरात्र कुलधर्म कुलाचार एवं धर्म आचरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं। इनमें देवी घटस्थापना, अखंड दीप प्रज्वलन, हवन, सरस्वती पूजन, तथा दशमी तिथि को विसर्जन का विशेष महत्व है।
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