19 Jan 2017, 05:38:58 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

  • आत्मा हैं मन और शरीर

    आत्मा को देखने का पहला द्वार है श्वास। भीतर की यात्रा का पहला द्वार है श्वास। हम बाहर की ओर दौड़ता है जब भीतर की यात्रा शुरू करनी होती है, तब प्रथम प्रवेशद्वार श्वास से गुजरना होता है

  • समय के साथ बदलना होगा

    उत्तराखंड में गढ़वाल के जौनसार बावर क्षेत्र में मशहूर परशुराम मंदिर है। चार सौ साल से इस मंदिर में परंपरा के नाम पर महिलाओं और दलितों के प्रवेश पर पाबंदी लगी हुई थी।

  • जब क्रोध आए तो कागज फाड़िए

    सेना के एक प्रमुख अधिकारी ने अमेरिका के तत्कालीन रक्षा-मंत्री के आर्डर को ठीक से न समझ पाने के कारण कोई भूल कर दी।

  • अहंकार मिटाना आवश्यक है

    विश्व के सबसे अमीर लोगों में से एक ‘हेनरी फोर्ड’ जब अपनी कीर्ति और कमाई की ऊंचाइयों तक पहुंच गए तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा था

  • सम से ज्यादा विषम

    हमें अपने शहरी ट्रेफिक को सुधारने के लिए नए सिरे से सोचना होगा। होता यह है कि समस्याएं हमारी अपनी होती हैं और हल हम विदेशों से ढूंढते हैं।

  • नजरिया बदलें, खुशियां साथ रहेंगी

    बात पुरानी है लेकिन है रोचक। एक बार एक मुनि तीर्थ यात्रा पर निकले, रास्ते में एक गांव आया। मुनि बहुत थक चुके थे। उन्होंने गांव में ही एक खेत के नजदीक बरगद के पेड़ के नीचे शरण ली।

  • मौन जोड़ता है परमात्मा से

    प्रार्थना भाव है। और भाव शब्द में बंधता नहीं। इसलिए प्रार्थना जितनी गहरी होगी, उतनी नि:शब्द होगी। कहना चाहोगे बहुत, पर कह न पाओगे।

  • विज्ञान का लाभ कृषि क्षेत्र को मिले

    तुअर दाल की कीमतों में कमी नहीं आने के बीच एसोचैम द्वारा चावल के दामों में भी उछाल आने की आशंका जताने से परेशान नागरिकों को महाराष्ट्र सरकार की एक योजना राहत प्रदान करने वाली है।

  • सहयोगियों के प्रति कृतज्ञ रहें

    गुलाब के फूल ऊपर की टहनी पर खिल रहे थे और गोबर उसकी जड़ में पड़ा था। गुलाब ने अपने सौभाग्य से गोबर के दुर्भाग्य की तुलना करते हुए गर्वोक्ति की और व्यंग्य से हंसा।

  • ईश्वर को कोई भी पा सकता है

    गुरुकुल में प्रवेश उत्सव समाप्त हो चुका था, और कक्षाएं नियमित चलने लगी थीं। योग और अध्यात्म पर कुलपति स्कंददेव के प्रवचन सुनकर विद्यार्थी संतोष का अनुभव करते थे।

  • पत्थरों पर फसल उगाने की कला

    क गर्म दोपहरी के दिन एक किसान बांसों के झुरमुट में बनी हुई जेन गुरु की कुटिया के पास रुका। उसने गुरु को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा।

  • अनेक को एक करना ही मनुष्य का लक्ष्य

    मनुष्य जब क्षुद्र बुद्धि भावना से प्रेरित होकर कोई काम करता है तो वह क्षुद्र बन जाता है और दु:ख पाता है। वही जब कोई ब्रह्म भावना लेकर काम करता है, तब उसको आनंद मिलता है। शांति मिलती है।

  • बड़ा दिखाने की चाहत में भटक रहा इनसान

    एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था। उसकी पत्नी ने कहा- ''वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं।

  • अपना भाग्य खुद बनाते है

    दो भाई किसी ज्योतिषी के पास गए। उसने दोनों को देखा। छोटे से उसने कहा- तुम्हें कोई राज्य मिलने वाला है। तुम बड़े शासक बनोगे।

  • हमारे कर्म ही सबसे महत्वपूर्ण होते है

    हमारी संस्कृति में आध्यात्मिकों की नजर में मोक्ष, एक सर्वोच्च कल्पना है। मोक्ष मिलना चाहिए ऐसी हर व्यक्ति की आंतरिक भावना होती है।

  • विश्वास से ज्यादा सशक्त होती है निष्ठा

    निष्ठा अविभाजित मन, अविभाजित चेतना का स्वभाव है। ईश्वर में आपकी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो। आत्मा में तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो।

  • मानव का मन विचारों के बीच झूलता है

    आध्यात्मिक ग्रंथों, कथा कहानियों में मन के बारे में विविध रूपों में चर्चा होती रहती है। किसी को इसकी चंचलता बेचैन करती है तो कोई इसकी हठधर्मिता का जिक्र करता है।

  • आपकी विशेषता ही तो आपका धर्म है

    वैराग्य का अर्थ क्या है? दुनिया में सभी कुछ विषय है। विषय छोड़ कर जाओगे कहां? अगर जंगल में चले गए तो वहां भी तुम्हारी ‘देह’ है, वह भी तो विषय है।

  • हमेशा रहस्यमय तरीके से होता है सृजन

    प्रकृति के पास कई रहस्य हैं। पश्चिमी देशों में आमतौर पर रहस्यों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, कुछ छुपाया है तो वह शर्मनाक होगा।

  • भगवान की भक्ति में ही छुपा है वैदिक ज्ञान

    जीव तथा भगवान की स्वाभाविक स्थिति के विषय में अनेक दार्शनिक ऊहापोह में रहते हैं। जो भगवान कृष्ण को परम पुरुष के रूप में जानता है, वह सारी वस्तुओं का ज्ञाता है।

  • आंतरिक ऊर्जा को सहेजना जरूरी

    तंत्र के पास पाप की धारणा नहीं, कोई अपराध-भाव नहीं। मात्र सचेत बने रहो। जो घट रहा है, उसके प्रति जागरूक बने रहो। सचेत, जो हो रहा है उसके प्रति सावधान। प्रवाह को चले आने दो।

  • कुपथ पर जाते ही ताकत हो जाती है क्षीण

    देवताओं और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था। राक्षसों के शस्त्र-बल और युद्ध-कौशल के सामने देवता टिक ही नहीं पा रहे थे।

  • वैराग्य की ओर ले जाता है संतोष का भाव

    वैराग्य की स्थिति वह है कि आपके पास कुछ है अथवा नहीं, इसका आप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

  • सकारात्मकता के लिए अहम है रुद्राभिषेक

    शास्त्र कहते हैं कि ‘शिव: अभिषेक प्रिय:’। अर्थात् शिव को अभिषेक अति प्रिय है। ब्रह्म का विग्रह रूप ही शिव हैं।

  • नारायण के ध्यान से होती है मोक्ष की प्राप्ति

    श्री मद्भागवत महापुराण में बहुत सुंदर और विशद् वर्णन मिलते हैं। तक्षक सर्प के काटने से अपनी मृत्यु होने के पूर्व राजा परीक्षित ने व्यासनंदन शुकदेवजी से पूछे गए प्रश्नों में यह भी पूछा कि मरते समय किसी बुद्धिमान मनुष्य को क्या करना चाहिए?

  • जीवन में कुछ भी शुभ या अशुभ नहीं होता

    समस्याएं हैं तो उनका समाधान भी होता ही है। एक बार एक महिला ने स्वामी विवेकानंद से कहा, स्वामीजी, कुछ दिनों से मेरी बायीं आंख फड़क रही है।

  • मुक्त हो जाने की कला का नाम है ध्यान

    मारी प्रवृत्ति है कि हम सुखद मनोभावों को छोड़ कर दुखद भावनाओं से चिपक जाते हैं। निन्यान्वे प्रतिशत लोग यही करते हैं, परंतु चेतना जब ध्यान द्वारा मुक्त और संवर्धित होती है, तब नकारात्मक मनोभावों को पकड़े रखने की प्रवृत्ति सहज ही मिट जाती है।

  • वेदों ने सोच को बेहतर बनाने की सीख दी

    हमारे ऋषियों ने तमाम तरह के जीवों, उनकी ध्वनि और विभिन्न आकृतियों के बीच के इस संबंध को समझा और उसमें महारत हासिल की।

  • ज्ञान के अनुकूल कर्म करना आवश्यक

    एक व्यक्ति प्रतिदिन आकर महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना करता था। उसका यह क्रम एक महीने तक चला, लेकिन उसके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

  • बिना अध्यात्म भौतिक विकास संभव नहीं

    यह प्रश्न लाजिमी है कि आखिर भौतिक विकास का आध्यात्मिकता से क्या संबंध है? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि लोग आध्यात्मिक जीवन को और सांसारिक जीवन को अलग-अलग कर देखते हैं।

  • शंकराचार्य ने दी दुर्जनों से दूर रहने की सीख

    आद्य शंकराचार्य ने कहा था- ''मोक्ष कारणं समग्रयां भक्तिरेव गरियसि।'' अर्थात तमाम पथ और पद्धति में भक्ति का स्थान सर्वोच्च है। इसलिए एक आदमी बुद्धिजीवी हो सकता है और नहीं भी हो सकता।

  • शिव के अंतर में ही है समूची सृष्टि

    शिव ने कहा है- मुझसे ही सब कुछ सृजित हुआ है। आप लोगों ने देखा है कि चना-मूंग को जल में भिगो कर रख देने पर अंकुर निकल आता है।

  • अपना परिचय औरों से न पूछें खुद के अंदर डूबकर खोजें

    पश्चिम बंगाल की यात्रा पर था। नम दोपहरी और हवा में एक विचित्र सी घुटन थी। एक युवक पसीने से लथपथ, चेहरे पर दुविधा और आंखों में जिज्ञासा लिए मिलने आया।

  • ईष्ट देव की आराधना से बढ़ता है आत्मबल

    हमें रोज कम से कम आधा घंटे तक अपने ईष्ट की आराधना करनी चाहिए। हमारे संकल्पों की सिद्धि हो, इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें। एक तरीका बहुत आसान है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत व्यापक है।

  • भगवान के अलावा कोई प्रशंसा का पात्र नहीं

    ष्ण भक्ति धारा को माधुर्य के साथ प्रवाहित करने का श्रेय भक्त कवि सूरदास को जाता है। विश्वास है कि उनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में संवत 1535 वैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था।

  • सेहतमंद रहकर करें ब्रह्म की प्राप्ति

    चंद्रमा को मन का देवता कहा जाता है और सूर्य को शरीर का। शरीर को रोग-रहित रखने के लिए, अच्छे स्वास्थ्य के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है।

  • इस चेहरे को भी पहचानिए

    वर्ष 2014 के आखिर में एक अंतरराष्ट्रीय चर्चित मीडिया ग्रुप के इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) ने एक शोध किया था, जो यह बता रहा था कि यूरोपीय देशों का राजनीतिक भविष्य कैसा होगा।

  • बंद आंखों में ईश्वर से होती है नजदीकी

    रोशनी हम सभी को अच्छी लगती है, क्योंकि रोशनी में ही हम देख पाते हैं कि कौन-सी चीज क्या है। बहुत से लोग अंधेरे में जाने से डरते हैं, खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।

  • योग्य बनने पर मिलती है प्रभु की कृपा

    कृष्ण के प्यारे सखा और उनके शिष्यों में से एक उद्धवजी ने एक बार प्रश्न पूछा, हे माधव! जब से तुम गोकुल और वृंदावन की गलियों को छोड़ कर मथुरा आए हो, तब से मैं देख रहा हूं कि तुम व्यवहार तो सब करते हो,

  • दूसरों की गलती बताने के चक्कर में खुद गलती न करें

    एक बार गुरु आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढ़ाया। पाठ पढ़ाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले, ''अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं।

  • सुख-शांति के लिए मन के भीतर झांकना चाहिए

    एक बार एक रानी नहाकर अपने महल की छत पर बाल सुखाने गई। उसके गले में हीरों का हार था। उसने उसे उतारकर आले पर रख दिया और बाल संवारने लगी। इतने में एक कौवा आया।

  • मुक्त हो जाने की कला ही ध्यान

    ध्यान से लोगों को परमानंद का अनुभव मिल सकता है। हमारी चेतना की तीन अवस्थाएं हैं- जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। एक चौथी अवस्था भी है, जिसमें हम न ही जागते हैं, न ही सपना देखते हैं और न ही सोते हैं। ऐसा ध्यान में अनुभव होता है।

  • मान्यताओं से मुक्त होकर ईश्वर तक पहुंचें

    महात्मा गौतम बुद्ध से एक व्यक्ति ने कहा, मैं ईश्वर को नहीं मानता। आपकी क्या राय है? बुद्ध बोले- तुम गलत हो। संसार में ईश्वर के अलावा कुछ और सत्य है ही नहीं। कुछ दिन बाद दूसरे व्यक्ति ने प्रश्न किया- प्रभो।

  • बचना है तो आत्मा के केंद्र की ओर भागें

    एक जेन बोध कथा है। जापान में अक्सर भूकंप आते रहते हैं। यह वहां आए एक ऐसे ही भूकंप के समय की घटना है। एक सद्गुरु को उनके एक शिष्य ने अपने घर में निमंत्रण दिया कि वे आएं और उसके घर को अपनी उपस्थिति से दिव्यता प्रदान करें।

  • सूर्य से शरीर और चंद्र से मन का संचालन

    सूर्य ही मनुष्य के इस जीवनचक्र की धुरी हैं। शरीर सूर्य के कारण सक्रिय होता है और मन चंद्रमा के कारण सक्रिय होता है। चंद्रमा की घटती हुई कलाओं का असर मानव के मन और मस्तिष्क पर पड़ता है।

  • मन चंचल लेकिन ज्ञान होता है अपरिवर्तनीय

    प्रथम स्तर पर मन, ज्ञान का आधार है। मन क्या है? मानव संरचना बहुकोशीय है। मानव मन के तीन भाग हैं। प्रथम है सामूहिक एककोशीय मन, द्वितीय है सामूहिक बहुकोशीय मन और तृतीय है उसका अपना मन।

  • सारी जिज्ञासा शांत होने पर ही जागती है श्रद्धा

    आशंका और प्रश्नों में अश्रद्धा है ही नहीं। आशंका और प्रश्न श्रद्धा की तलाश हैं। बुद्धि बाधा नहीं बनती। बुद्धि तुम्हारा साथ दे रही है। बुद्धि कहती है- जल्दी श्रद्धा मत कर लेना, नहीं तो कच्ची होगी।

  • अपने बनाए कर्म के फंदे को खुद ही तोड़ें

    आप जिनसे बहुत प्रेम करते हैं या जिनसे आप बहुत घृणा करते हैं, उन दोनों के साथ ही आपका बहुत सारा कर्म बंधन है। कई बार होता है कि आप किसी इंसान से कभी नहीं मिले और वह भी कहीं बहुत दूर है, फिर भी आप उससे नफरत करते हैं।

  • अंधकार और प्रकाश के अंतर को जानें

    प्रकाश से हर चीज स्पष्ट होती है, लेकिन जब आपका अनुभव बुद्धि की सीमाओं को पार करना शुरू करता है, तब हम ईश्वर को अंधकार के रूप में बताने लगते हैं। प्रकाश बस एक क्षणिक घटना है। इसका स्रोत जल रहा है, कुछ समय के बाद यह जल कर खत्म हो जाएगा।

  • सही कर्म आत्मा के निकट पहुंचने में मददगार

    नए साल के समय बहुत से लोगों को अचानक यह अहसास होता है, अरे! एक साल और बीत गया! समय धारा के इस बहाव के प्रति हम कुछ क्षणों के लिए आश्चर्य करते हैं और उसके बाद फिर से व्यस्त हो जाते हैं।

  • हिंदू धर्म की धुरी हैं भगवान विष्णु

    हिंदू धर्म में सर्वाधिक आस्था प्राप्त त्रिदेव विष्णु, ब्रह्मा और शिव में हरेक का अपना महत्व और मान्यता है। आस्था के मामलों में अक्सर सवाल और बहस की जगह नहीं होती।

  • मनुष्य के पास सबसे बड़ी जागीर है जीवन

    तर्कशास्त्री पं. रामनाथ एक छोटी-सी जगह में बने गुरुकुल में छात्रों को पढ़ाते थे। कृष्णनगर के राजा शिवचंद्र को यह पता लगा तो उन्हें बहुत दुख हुआ कि ऐसा महान विद्वान भी गरीबी में रह रहा है।

  • गुरु वे ही हो सकते हैं जो महाकाल हों

    अध्यात्म जगत में वे ही गुरु हो सकते हैं, जो मनुष्य को ऊपर उठाकर आत्मिक उज्ज्वलता को प्रकाशित कर सकें। इसलिए गुरु वे ही हो सकते हैं, जो महाकाल हैं। अन्य कोई गुरु नहीं हो सकता।

  • परमानंद जीवन का सबसे बड़ा मकसद

    मानव जीवन का मकसद वेद शास्त्र के मुताबिक परमानंद की प्राप्ति है। यह परमानंद कहां मिलता है, क्या इसका कोई पता-ठिकाना है, यदि है तो बताओ, मैं भी वहां जाना और पाना चाहता हूं। एक नास्तिक व्यक्ति ने एक योगी से सवाल किया।

  • रंगों के उचित प्रयोग से भी आती है खुशहाली

    प्रकृति एक इंद्रधनुष के समान है। रंग हमारी भावनाओं को दर्शाते हैं। हर रंग का जीव के मन और शरीर से बहुत गहरा संबंध होता है, जैसे लाल रंग ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है। इसलिए शक्ति पूजा में अनार, गुड़हल के पुष्प, लाल वस्त्र इत्यादि लाल वस्तुओं का उपयोग किया जाता है।

  • मठ के साथ मन का कूड़ा भी कर लिया साफ

    एक किसान, जो अधेड़ अवस्था पार कर चुका था, एक बौद्ध मठ के द्वार पर आकर खड़ा हो गया। जब भिक्षुओं ने मठ का द्वार खोला तो उस किसान ने अपना परिचय कुछ इस प्रकार दिया, भिक्षु मित्रों! मैं विश्वास से ओतप्रोत हूं और आप लोगों से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूं।

  • देवतुल्य बन सकता है आपका मन

    जब हम कहते हैं कि शिव ने तीसरी आंख खोल दी, तो इसका मतलब है कि उन्होंने अपने अनुभव की सीमाओं को असीमित तरीके से बढ़ा लिया। फिर पूरा का पूरा जगत उनका एक हिस्सा बन गया और वे खुद सबका केंद्र, लेकिन आपको कैसे पता कि वे केंद्र हैं? यह कोई रहस्यवाद की बात नहीं है।

  • वैराग्य का मतलब बुराइयों से अप्रभावित रहना

    भगवान जब इस संसार में आते हैं, तब दुनिया के मनुष्यों में एक ध्रुवीकरण हो जाता है। कुछ एकदम उनके आदेश के अनुसार हर काम करने को तैयार हो जाते हैं और कुछ एकदम उनके खिलाफ हो जाते हैं।

  • प्राणायाम से होती है परमात्मा से निकटता

    प्राणायाम परमपिता परमेश्वर की प्राप्ति कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद है। सभी ऋषि-मुनि, योगी इसी के सहारे शरीर में मौजूद सात चक्रों को एक के बाद एक प्राप्त कर लेते हैं। इसकी तीन विधियां हैं।

  • संकट के दौर में भी शिष्टता नहीं छोड़ें

    एक अगर आप राम के जीवन की घटनाओं पर गौर करें तो पाएंगे कि वह मुसीबतों का एक अंतहीन सिलसिला था। सबसे पहले उन्हें अपने जीवन में उस राजपाट को छोड़ना पड़ा, जिस पर उस समय की परंपराओं के अनुसार उनका एकाधिकार था।

  • जीवन में आवश्यक हैं चित्त की संवेदनाएं

    महावीर स्वामी की जब भी बात होती है तो वहां अहिंसा अनिवार्य रूप से उपस्थित हो जाती है, लेकिन उसके साथ ये सवाल भी तैरने लगते हैं कि क्या अहिंसा नकारात्मक है या इसका सकारात्मक स्वरूप भी है?

  • धर्म के वास्तविक स्वरूप की स्थापना जरूरी

    एक सेठ के घर में एक ब्राह्मण रसोइया था। उसे ठाकुर कहा जाता था। माहेश्वरी परंपरा में तिलक दो तरह से किए जाते हैं - खड़ा तिलक और आड़ा तिलक। सेठजी खड़ा तिलक करते थे और ठाकुर आड़ा।

  • परमात्मा सागर है और हम सिर्फ एक बूंद

    संत ऑगस्टिन सत्य की खोज में अपना सारा सुख-चैन खो बैठे थे। परमात्मा को पाने की चाहत में उन्हें पता ही नहीं चलता था कि दिन और रात कब बीत जाते। शास्त्र, शब्द और विचारों के बोझ तले वह दब से गए थे।

  • जीवात्मा-परमात्मा सब कुछ एक ही

    मनन का अर्थ है सोचना, विचारना, चिंतन करना। मन को एक दिशा में ले जाने के लिए जो विचार किया जाता है, उसे मनन कहते हैं। श्रवण अर्थात सद्ग्रंथों के अध्ययन, सुनने व साधुओं की सत्संगति से सत्य-असत्य, नित्य-अनित्य का विवेक उत्पन्न होता है। अर्थात, सत्य-असत्य, आत्मा-अनात्मा का विश्लेषण करने की विचार शक्ति को विवेक कहते हैं और इस प्रकार किए जाने वाले विश्लेषण को मनन कहते हैं। गुरु द्वारा अथवा स्वयं ईश्वर की कथाओं को सुनने व बारंबार मनन करने से एकमात्र परम सत्य, नित्य ईश्वर के चरणों में प्रेम उत्पन्न होता है और समस्त विनाशशील, अनित्य एवं सांसारिक वस्तुओं से आसक्ति हट जाती है।