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मध्यस्थता का अब कोई औचित्य नहीं मंदिर ही बनेगा : हिन्दू महासभा

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Oct 17 2019 6:49PM | Updated Date: Oct 17 2019 6:49PM
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नई दिल्ली। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने अयोध्या विवाद मामले में मध्यस्थता के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा है कि इसका अब कोई औचित्य नहीं रह गया है और विवादित स्थल पर ही राम मंदिर बन कर रहेगा। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ पाताल नाथजी अवधूत ने यहां छत्तीसगढ़ के धमतरी से संबंधित लव जेहाद के एक मामले पर चर्चा के लिए गुरुवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही। हिन्दू महासभा और अन्य हिन्दूवादी संगठनों ने कहा है कि देश में लव जेहाद को बढ़ावा देने के लिए विदेशों से धन आ रहा है जिसे रोकने के लिए सरकार को धर्मांतरण के खिलाफ कठोर कानून बनाना चाहिए। छत्तीसगढ़ के धमतरी निवासी अशोक कुमार जैन ने अपनी 23 वर्षीय बेटी बेटी अंजली जैन के लव जेहाद का शिकार बनने का आरोप लगाते हुए कहा कि मोहम्मद इब्राहिम सिद्दीकी नामक व्यक्ति ने फर्जी पहचान बताकर उनकी बेटी को अपने प्रेम के जाल में फंसाया और उससे शादी कर ली।
 
गौरतलब है कि बुधवार को इतिहास के पृष्ठों को पलटते हुए, धार्मिक मान्यताओं एवं परम्पराओं तथा पुरातात्विक सवालों पर विचारोत्तोजक बहस के बीच अयोध्या की विवादित जमीन से संबंधित मुकदमे पर 40 दिन तक जिरह होने के बाद इस ऐतिहासिक सुनवाई का पटाक्षेप हो गया। अब पूरे देश की निगाहें इस मामले के फैसले पर टिकी हैं। भारतीय राजनीति पर तीन दशक से अधिक समय से छाये इस विवाद की सुनवाई के दौरान राम जन्मभूमि पर अपने दावे के पक्ष में जहां रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, ऑल इंडिया हिन्दू महासभा, जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति एवं गोपाल सिंह विशारद ने दलीलें दी, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड, हासिम अंसारी (मृत), मोहम्मद सिद्दिकी, मौलाना मेहफुजुरहमान, फारुख अहमद (मृत) और मिसबाहुद्दीन ने विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक का दावा किया। इस मामले में शीर्ष अदालत की ओर से न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की ओर से मध्यस्थता असफल रहने की बात बताये जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई की और सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिये। 
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