27 May 2017, 03:59:56 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

आध्यात्मिक ग्रंथों, कथा कहानियों  में मन के बारे में विविध रूपों में चर्चा होती रहती है। किसी को इसकी चंचलता बेचैन करती है तो कोई इसकी हठधर्मिता का जिक्र करता है। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारी बीमारियां इससे जुड़ी होती हैं। मन की शांति इंसान में स्फूर्ति भरती है तो अशांति उसे रोगी बना देती है। मन अच्छी से अच्छी और बुरी से बुरी स्थिति की कल्पना कर सकता है। अच्छे विचार आते हैं, कुछ देर रमते हैं, फिर गायब हो जाते हैं। पर बुरे विचार घेर लें तो कोशिशों के बावजूद निकलने का नाम नहीं लेते। एक शक पैदा करते हैं। हम उसका हल निकाल लें तो, दूसरा लाकर वार करते हैं।

मन जितना कमजोर पड़ता है, वे उतने ही ताकतवर होते जाते हैं। वे हमें बीमारी की सी हालत में पहुंचा देते हैं। तभी तो कहा जाता है कि मन एक अच्छा नौकर और बुरा मालिक होता है। उसके अधीन व्यक्ति को कभी शांति नहीं मिल सकती। मनोवैज्ञानिक कार्लयुग का मानना है कि 'मन का पैंडुलम सार्थक और निरर्थक विचारों के बीच झूलता रहता है।' स्वामी रामतीर्थ ने कहा है कि 'तुम जहां और जैसे हो, उसमें अगर खुश नहीं हो तो कभी खुश नहीं रह पाओगे।'  मन को खालीपन नहीं भाता। सार्थक विचारों में व्यस्त न रखने पर गलत विचार उसे घेर लेते हैं। नियंत्रित मन हमारा मित्र बनकर हमारे व्यवहार में सहनशीलता, स्नेह, क्षमा कर सकने की क्षमता भरता है। सदा कुछ नया, सुंदर, अलग काम या भाव खुद में भरें, यही बेहतर रहेगा।

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