18 Nov 2018, 21:54:40 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

कलाकार: दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू, अंगद बेदी, विजय राज, सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा
निर्देशक: शाद अली 
निर्माता: सोनी पिक्चर्स, चित्रांगदा सिंह, दीपक सिंह
 
मुंबई। बॉलीवुड में इन दिनों बायोपिक की बयार चल रही है। दो हफ्ते पहले ही ‘संजू’ रिलीज हुई थी और अब ‘सूरमा’ के जरिये भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह का जीवन-संघर्ष सामने है। अपने करियर के शुरुआती दौर में ही दुर्घटनावश गोली लगने की वजह से संदीप का करियर खत्म होने की कगार पर पहुंच गया। लेकिन उन्होंने संघर्ष किया, अपने पैरों पर खड़े हुए, फिर से हॉकी स्टिक थामी और भारतीय हॉकी के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। भारतीय पुरुष हॉकी टीम का नेतृत्व भी किया और अर्जुन अवॉर्ड से भी नवाजे गए। 
 
‘सूरमा’ संदीप की इसी यात्रा की कहानी कहती है। हरियाणा के शाहाबाद के संदीप सिंह (दिलजीत दोसांझ) और उसका बड़ा भाई बिक्रमजीत सिंह (अंगद बेदी) बचपन से ही हॉकी खिलाड़ी बनना चाहते थे। दोनों स्थानीय कोच के पास हॉकी का प्रशिक्षण लेने जाते हैं, लेकिन कोच की सख्ती से तंग आकर संदीप हॉकी खेलना ही छोड़ देता है। वर्षों बाद जब एक दिन संदीप अपने बड़े भाई को खाना देने मैदान में जाता है तो उसकी नजर एक महिला हॉकी खिलाड़ी हरप्रीत (तापसी पन्नू) पर पड़ती है और संदीप को उससे प्यार हो जाता है। हरप्रीत चाहती है कि संदीप भारत के लिए हॉकी खेले। संदीप उसकी खातिर फिर से हॉकी खेलना शुरू करता है। 
 
जल्दी ही संदीप का चयन भारतीय टीम में हो जाता है। वह अपने पहले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा गोल कर डालता है। एक दिन वह अपने घर से एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए जा रहा होता है कि ट्रेन में किसी की रिवॉल्वर से गोली चल जाती है और संदीप की कमर में लग जाती है। इस दुर्घटना में संदीप के कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है।  निस्संदेह निर्माता और निर्देशक एक हॉकी खिलाड़ी के जीवन पर फिल्म बनाने का साहस करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं। बहुत लोगों को तो संदीप के साथ हुई दुर्घटना और उनकी वापसी की कहानी के बारे में पता भी नहीं होगा। 
 
यह फिल्म बताती है कि भारत के पास संदीप सिंह जैसा एक फुल बैक था, जो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ड्रैग फ्लिकर था, जो दुनिया में सबसे ज्यादा गति से ड्रैग फ्लिक करता था और उसकी रफ्तार के आगे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर भी लाचार हो जाते थे।  इस फिल्म के जरिये संदीप सिंह के संघर्ष को शाद अली ने मनोरंजक और भावनापूर्ण तरीके से पर्दे पर उतारा है। पहले हाफ में शाद अली ने संदीप के हॉकी खिलाड़ी बनने की यात्रा को दर्शाया है, तो दूसरे हाफ में उनके दुख, संघर्ष और फिर से खड़ा होने की यात्रा को। उन्होंने इस बात की पूरी कोशिश की है कि फिल्म एक डॉक्यूमेंट्री बन कर न रह जाए। इसके लिए उन्होंने हल्की-फुल्की कॉमेडी, पारिवारिक ड्रामा, भावुकता, रोमांस और रोमांच, सबका सहारा लिया है। अपने प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी रहे हैं। उन्होंने किरदारों को अच्छे से गढ़ा है। 
 
दो भाइयों के बीच की ‘बॉन्डिंग’ को भी बढ़िया तरीके से चित्रित किया है। रोमांस के दृश्य बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन जितने हैं, वे दिल को छूते हैं। वैसे फिल्म में नाटकीयता काफी है और ये कुछ जगहों पर अखरती भी है। हॉकी मैचों के दृश्य रोमांचित करते हैं। पहले हाफ में फिल्म की गति ठीक है और फिल्म दर्शकों को गुदगुदाती भी है। लेकिन दूसरे हाफ में गति थोड़ी धीमी होती है और क्लाईमैक्स में जैसा रोमांच महसूस होना चाहिए था, वैसा महसूस नहीं होता।
 
अगर ‘हिप हिप हुर्रे’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘चक दे इंडिया’ के क्लाईमैक्स को याद करें तो उस मुकाबले यह फिल्म थोड़ी हल्की नजर आती है। शाद अली यहां थोड़े चूक-से गए हैं। फिल्म का गीत-संगीत ठीक है और फिल्म के मिजाज के अनुकूल है। सिनमेटोग्राफी अच्छी है। कैमरे ने माहौल को सफलतापूर्वक दर्शाया है। 
 
इस फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष है कलाकारों का अभिनय। मुख्य भूमिका में दिलजीत दिल जीत लेते हैं। एक बेपरवाह नौजवान, एक प्रेमी, एक शानदार हॉकी खिलाड़ी, एक निराश हताश युवा और गिर कर उठने का जज्बा रखने वाला इनसान, अपने किरदार के हर पहलू को उन्होंने जीवंत कर दिया है। तापसी पन्नू खिलाड़ी और प्रेमिका दोनों रूपों में प्रभावित करती हैं। वह इस फिल्म में खालिस स्पोटर्स पर्सन की तरह दिखी हैं। अंगद बेदी ने इस फिल्म को बेहतर बनाने में पूरा योगदान दिया है।
 
संदीप के बड़े भाई की भूमिका में वह बहुत अच्छे लगे हैं। विजय राज का किरदार भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कोच हरेंद्र सिंह से प्रेरित लगता है। उनके किरदार का नाम हैरी है और वह मूल रूप से बिहार के पटना का है। हरेंद्र सिंह भी बिहार के छपरा से हैं और हैरी सर के नाम से जाने जाते हैं। विजय राज बेहतरीन अभिनेता हैं और किसी भी रोल में छाप छोड़ जाते हैं। इस फिल्म में उनके वनलाइनर मजेदार हैं। हालांकि इस किरदार में नाटकीयता बहुत है। 
 
संदीप के पिता की भूमिका में सतीश कौशिक अपने चिर-परिचित कॉमेडी वाले अंदाज से हट कर एक अलग अंदाज में हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स के चेयरमैन की भूमिका में कुलभूषण खरबंदा अच्छे लगे हैं। बाकी कलाकार भी अच्छे हैं। निस्संदेह यह फिल्म हमें खेलों की दुनिया के सबसे शानदार ‘कमबैक’ का साक्षी बनने का मौका देती है। यह फिल्म हंसाती है, भावुक करती है, संघर्ष का जज्बा पैदा करती है और प्रेरित करती है। देख आइए, अच्छा लगेगा। 
 

 

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