26 Sep 2018, 18:15:00 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

14 साल बाद शनिश्चरी अमावस्या पर आज शुभ योग बना है। इससे पूर्व 20 मार्च 2004 में चैत्र मास में शनैश्चरी अमावस्या आई थी। 2018 के उपरांत 2025 में ये योग पुन: बनेगा यानि आज से 7 साल बाद। शनि-मंगल की युति के अतिरिक्त पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र, नाग करण, कुंभ राशि का चंद्रमा और बहुत सारे संयोग बन रहे हैं।  इस शुभ योग ने शनिदेव को प्रसन्न करना बहुत आसान बना दिया है। चैत्र अमावस्या को विक्रमी संवत का आखिरी दिन माना जाता है और इसके अगले दिन यानी प्रतिपदा से नव विक्रमी संवत का भी आरंभ होता है।
 
किसी भी माह में शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। यह 'पितृकार्येषु अमावस्या' के रूप में भी जानी जाती है। कालसर्प, ढैय्या व साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने हेतु शनि अमावस्या एक दुर्लभ दिन है। शनि परमात्मा के जगदा-आधार स्वरूप 'कच्छप' का ग्रहावतार व कूर्मावतार भी कहा गया है। शनि समस्त ग्रहों के मुख्य नियंत्रक हैं व उन्हें ग्रहों के न्यायाधीश मंडल का प्रधान न्यायाधीश कहा जाता है। 
 
शनिधाम तिलवारा में विशेष पूजन
शनि अमावस्या पर शनिधाम तिलवारा में विशेष पूजन-अर्चन का आयोजन आज किया जा रहा है। लगभग 63 साल के बाद शनि अमावस्या पर क्रियायोग बन रहा है, जो शनि पीड़ा निवारण के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शनिधाम के मुख्य पुजारी पं. अनिल मिश्रा ने बताया कि इस अमावस्या को सर्प कष्ट निवारक, दान-पुण्य की अमावस्या भी माना जाता है। सात प्रकार के अनाज, तिल, तेल आदि के दान से ग्रह शांति का उत्तम योग शनि प्रिय काल रात्रि अमावस्या ही होती है।
 
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