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Gagar Men Sagar

चीफ जस्टिस के लिए चीफ हैं माता-पिता

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Jan 6 2017 10:52AM | Updated Date: Jan 6 2017 10:52AM
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-वीना नागपाल

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर के लिए उनके माता-पिता की सेवा भी सर्वोच्च प्राथमिकता रही। उनकी माता का स्वर्गवास हो चुका है, परंतु उनके 92 वर्षीय वृद्ध पिता की सेवा में खेहर पूरी तरह समर्पित हैं। जब तक उनकी मां जीवित रहीं वह और उनकी पत्नी मधुरप्रीत कौर उनकी पूरी देखभाल करते व सेवारत रहते। दरअसल हमें पालने में, हमारा पोषण करने में और हमें जमीन पर अपने पैर जमाने के लिए माता-पिता का बहुत योगदान होता है। कुछ इसे मन से स्वीकार करते हैं, तो कुछ ऊपरी तौर पर और कुछ बिलकुल नहीं मानते।

ऐसा विदित हुआ है और जानकारी भी मिली है कि खेहर रात को अपने पिता के कमरे में ही सोते हैं, जिससे कि यदि उन्हें किसी भी प्रकार की आवश्यकता हो तो उसे पूरा करने के  लिए वह वहां हाजिर रहें। वह यदि चाहें तो ऐसी व्यवस्था कर सकते हैं कि एक सहायक को पिता की सेवा में लगा दें, जिससे वह पिता की जानकारी लेते रहे और स्वयं भी निरीक्षण करते रहें कि उनके पिता को कोई असुविधा तो नहीं है। पर, वह स्वयं उस कमरे में सोते हैं जिससे पिता को वह अपनत्व व समीपता मिले जिसकी इस उम्र में कितनी आवश्यकता होती है। आखिर कभी इन्हीं माता-पिता ने अपनी संतान को अपने सीने से लगाकर अपने साथ सुलाया है और उसकी प्रत्येक  प्राकृतिक व अन्य प्रकार की मांग को स्वयं असुविधा में रहकर भी तुरंत पूरा किया है। माता-पिता की सेवा से मिलने वाली दुआएं व आशीर्वाद इतने भरपूर होते हैं कि वह वास्तव में जीवन की सफलता में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। आज खेहर को उन्हीं दुआओं का प्रतिफल मिला है।

जब कभी ऐसे समाचार पढ़ने या जानने को मिलते हैं कि कि सी बेटे ने अपने माता-पिता पर हाथ उठाया तथा उन्हें खाने-पीने से भी वंचित रखा तब ऐसी संतान को जीवन में कुछ नहीं मिलने वाला- यह बात निश्चित लगती है। आखिर माता-पिता को इससे केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक आघात भी पहुंचता है और वह दिन-रात तड़पते हैं तब उस संतान का स्वयं का जीवन कभी सुखी व आनंद से भरा नहीं हो सकता। कहीं न कहीं यह बेचैनी उसे भीतर से अवश्य कचोटती रहती है कि वह सही नहीं कर रहे। ऐसे व्यक्ति चैन की नींद नहीं सो सकते। इसी तरह की कुछ संतानें तो एक कदम और आगे बढ़ी हुई होती हैं। वह तो माता-पिता को उन्हीं के द्वारा इतने परिश्रम से बनाए गए घर से भी निकालने के रोज ही नित नए हथकंडे अपनाते हैं।

पिछले दिनों जब दिल्ली के कोर्ट में इस तरह का एक केस आया जिसमें पिता को स्वयं पुत्र के प्रतिवाद में अपना बयान देने कि लिए कोर्ट में खड़ा होना पड़ा तो अपनी बात कहते-कहते पिता ने कितनी बार अपनी भर आई आंखों से आंसू पोछें। वह पुत्र के इतना प्रताड़ित करने के बाद भी उसके विरुद्ध बयान नहीं देना चाहते थे। इसी केस में जब माननीय न्यायाधीश ने अपना निर्णय सुनाया तब कहा कि बेटा अपने पिता का उनके द्वारा अर्जित धन से बनाया गया घर नहीं छीन सकता, आखिर वृद्ध माता-पिता इस तरह घर से बाहर नहीं किए जा सकते। वह कहां जाएंगे: कहते हैं कि निर्णय सुनाते समय माननीय न्यायाधीश ने भी थोड़े भीगे स्वर में यह निर्णय सुनाया।

सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीशखेहर पूरे समाज के सामने एक सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका यह व्यवहार जितने भी दिलों को छू सके उतना ही समाज के लिए अच्छा होगा। अगर परिवार अपने-अपने वृद्धजन के प्रति अपना दायित्व समझ लें तो वृद्धा आश्रम की व्यवस्था करने की सामाजिक कर्तव्य करने वालों को जरूरत ही नहीं पड़ेगी। परिवारों के वृद्धों की देखभाल परिवार की प्राथामिक जिम्मेदारी है। यदि खेहर की इस सेवा के उच्च आदर्श तक नहीं पहुंच सकते तो कम से कम इतना तो कर सकते हैं कि उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित न करें और सहजता, स्वभाविकता व अपनत्व से उन्हें रहने दें। उनके कमरे में नहीं सो सकते तो कुछ पलों व क्षणों के लिए ही सही उनके पास बैठ जाएं। यही वह सर्वोच्च आदर्श8 है जो सर्वोच्च न्यायाधीश से सीखा जा सकता है।

nagpal.veena@yahoo.com

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