27 Jun 2017, 09:05:16 के समाचार About us Android App Advertisement Contact us app facebook twitter android

-अश्विनी कुमार
पंजाब केसरी दिल्ली के संपादक


आखिर वही हुआ जिसका डर था। देश की सर्वोच्च अदालत ने भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को पद से बर्खास्त कर दिया। इन दोनों की हालत तो यह है कि-बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले। सुप्रीम कोर्ट ने यह कड़ी चेतावनी दी थी कि आप लोग सुधर जाएं नहीं तो हम अपने आदेश से इसे सुधार देंगे। देश की शीर्ष अदालत बार-बार जस्टिस लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने की हिदायत दे रही थी, लेकिन भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और अन्य पदाधिकारियों ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई और न ही अदालत के निर्देशों पर अमल करने की जिम्मेदारी को समझा। दुनियाभर में सबसे धनी भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड ने पिछले कुछ वर्षों से खुद को तमाशे में बदल दिया था, उसका परिणाम तो निकलता ही था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार बोर्ड के कामकाज के लिए प्रशासकों की समिति गठित होगी। यद्यपि अनुराग ठाकुर और अजय शिर्के ने कोर्ट के फैसले पर बहुत सधी हुई प्रतिक्रिया दी है लेकिन शीर्ष अदालत के फैसले से बोर्ड की स्वायत्तता प्रभावित होगी या नहीं? यह सवाल भी सबके सामने है।

भारतीय क्रिकेट बोर्ड का इतिहास बहुत पुराना है। 21 नवंबर, 1927 को दिल्ली में हुई एक बैठक में पटियाला, दिल्ली, संयुक्त प्रांत, राजपूताना, अलवर, भोपाल, ग्वालियर, वडोदरा, काठियावाड़, मध्य भारत, सिंध और पंजाब के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक में क्रिकेट के नियंत्रण के लिए एक बोर्ड बनाने के लिए आम सहमति बन गई थी। दिसंबर 1928 में बीसीसीआई को 6 संघों से संबद्ध होकर तमिलनाडु सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत किया गया था। बहुत से लोग इससे जुड़े जिन्होंने क्रिकेट के लिए बहुत कुछ किया। भारत में क्रिकेट उछाल के साथ बीसीसीआई क्रिकेट के लिए नहीं बल्कि अपने एकाधिकार के लिए कुख्यात होता गया।

अगर स्वतंत्र भारत का इतिहास देखें तो केंद्रीय और राज्य स्तरीय खेल संघों पर राजनेताओं और उद्योगपतियों की जमात कई वर्षों से कब्जा जमाए बैठी रही। इन्हीं खेल संघों में पूर्व खिलाड़ियों की मौजूदगी अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। खेलों में भ्रष्टाचार पनपने की एक बड़ी वजह यह भी रही कि इन संघों में राजनीति के खिलाड़ी कब्जा जमाए बैठे रहे। खेलों पर राजनीतिक जमावड़े को समाप्त करने के लिए वर्ष 2011 में तत्कालीन युवा एवं खेल मंत्रालय संभाल रहे अजय माकन एक विधेयक लेकर आए थे। उन्होंने ईमानदार कोशिश की थी कि खेल संघों को सूचना के अधिकार के तहत लाया जाए ताकि पूरी पारदर्शिता लाई जा सके। उन्होंने कोशिश की थी कि खेल संघों की कार्यकारिणी में वे लोग भी शामिल किए जाएं जो कभी खेलों से खिलाड़ी के तौर पर जुड़े रहे हों, लेकिन अजय माकन के प्रयास सफल नहीं हुए। ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने कभी कोई खेल नहीं खेला, लेकिन खेल संघों में बैठकर खिलाड़ियों का भविष्य तय करते रहे। यह भी सच्चाई है कि बीसीसीआई ने देश के क्रिकेट को नया आयाम दिया लेकिन क्रिकेट भ्रष्टाचार का गढ़ बन गई। हाल ही में हमने देखा कि इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर राष्टÑमंडल खेल घोटाले के आरोपी सुरेश कलमाड़ी को किस तरह अध्यक्ष घोषित कर दिया गया था। खेल मंत्री विजय गोयल ने एसोसिएशन की मान्यता रद्द कर सही कदम उठाया है।

मैच फिक्सिंग, स्पाट फिक्सिंग के शर्मनाक स्कैंडल सामने आते रहे। एक के बाद एक खुलासों के बाद खेल दागदार नजर आने लगा। आईपीएल खुलासों से तो तूफान खड़ा हो गया था। मामला कोर्ट में पहुंचा तो क्रिकेट बोर्ड में सुधार के लिए जस्टिस लोढा के नेतृत्व में समिति बनाई गई जिसने पिछले वर्ष 4 जनवरी को अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी थीं। क्रिकेट बोर्ड शुरुआती दौर में जस्टिस लोढा समिति की सिफारिशों का विरोध करता रहा और यह कहता रहा कि समिति की सिफारिशें व्यावहारिक नहीं, जो सिफारिशें अच्छी हैं उन्हें लागू किया जाएगा।
लोढा समिति की सिफारिशों पर उदासीन रवैए पर बीसीसीआई को शीर्ष अदालत ने कई बार फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोढा कमेटी की अधिकतर सिफारिशों पर मुहर लगाकर क्रिकेट बोर्ड को करारा झटका दिया। लोढा समिति की सिफारिशों के अनुसार मंत्री और नौकरशाह बीसीसीआई का हिस्सा नहीं होंगे, बोर्ड में कैग का प्रतिनिधि भी होगा, 70 वर्ष से ज्यादा की उम्र का कोई बोर्ड का अधिकारी नहीं होगा।

यह उसी दिन तय हो गया था कि कई लोगों को अपने पद छोड़ने होंगे। बेहतर होता कि और अन्य पदाधिकारी कोर्ट के आदेशों को स्वीकार करते हुए विनम्रता से सिफारिशों को लागू करते, लेकिन उन्होंने दांव-पेच खेलने शुरू कर दिए। अनुराग और शिर्के ने राज्य क्रिकेट संघों का हवाला देकर सुधारों को लागू न करने का बहाना बनाए रखा। अनुराग ठाकुर की हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन से भी छुट्टी होगी, क्योंकि लोढा समिति के अनुसार लगातार दो वर्ष या 9 वर्ष तक ही कोई व्यक्ति राज्य क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष रह सकता है। अनुराग 16 वर्षों से अध्यक्ष पद पर हैं लेकिन बोर्ड अध्यक्ष पद से उनकी विदाई 7 माह में ही हो गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर राज्य क्रिकेट संघों पर पड़ना निश्चित है। क्रिकेट पूरी तरह पैसे का खेल और इस खेल में कुछ लोगों का खेल भी था। यह खेल अब बंद होना ही चाहिए। देखना यह है कि प्रशासकों की टीम बोर्ड का कामकाज कैसे संभालती है।

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